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Thursday, April 3, 2025
Saturday, March 29, 2025
खिड़की पर अश'आर
जैसे रेल की हर खिड़की की अपनी अपनी दुनिया है
कुछ मंज़र तो बन नहीं पाते कुछ पीछे रह जाते हैं
अमजद इस्लाम अमजद
सो गए लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी
नासिर काज़मी
रात थी जब तुम्हारा शहर आया
फिर भी खिड़की तो मैं ने खोल ही ली
शारिक़ कैफ़ी
दरवाज़ा बंद देख के मेरे मकान का
झोंका हवा का खिड़की के पर्दे हिला गया
आदिल मंसूरी
खिड़की के रस्ते से लाया करता हूँ
मैं बाहर की दुनिया ख़ाली कमरे में
ज़ीशान साहिल
खिड़की में कटी हैं सब रातें
कुछ चौरस थीं कुछ गोल कभी
गुलज़ार
हैं अँधेरी कोठरी में नूर की खिड़की "ख़याल"
आँख अपनी बंद करके देख तो दिल की तरफ़
सतपाल ख़याल
Monday, March 24, 2025
विनोद कुमार शुक्ल
सबसे ग़रीब आदमी की
सबसे कठिन बीमारी के लिए
सबसे बड़ा विशेषज्ञ डॉक्टर आए
जिसकी सबसे ज़्यादा फ़ीस हो
सबसे बड़ा विशेषज्ञ डॉक्टर
उस ग़रीब की झोंपड़ी में आकर
झाड़ू लगा दे
जिससे कुछ गंदगी दूर हो।
सामने की बदबूदार नाली को
साफ़ कर दे
जिससे बदबू कुछ कम हो।
उस ग़रीब बीमार के घड़े में
शुद्ध जल दूर म्युनिसिपल की
नल से भरकर लाए।
बीमार के चीथड़ों को
पास के हरे गंदे पानी के डबरे
से न धोए।
कहीं और धोए।
बीमार को सरकारी अस्पताल
जाने की सलाह न दे।
कृतज्ञ होकर
सबसे बड़ा डॉक्टर सबसे ग़रीब आदमी का इलाज करे
और फ़ीस माँगने से डरे।
सबसे ग़रीब बीमार आदमी के लिए
सबसे सस्ता डॉक्टर भी
बहुत महँगा है।
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Tuesday, March 18, 2025
"चर्ख़े" पर चंद अश'आर
माने न माने कोई हक़ीक़त तो है यही
चर्ख़ा है जिस के पास उसी की कपास है
निदा फ़ाज़ली
अज़ल से चाँद में चर्ख़ा चला रही है मगर
'नवाज़' अब भी वो बुढ़िया निढाल थोड़ी है
नवाज़ असीमी
नानी ने तर्क कर दी क्यूँ रस्म-ए-क़िस्सा-गोई
क्या चाँद से किसी ने चर्ख़ा उठा लिया है
पारस मज़ारी
जिसे हम लोग मिल कर आश्रम में छोड़ आए थे
वो चरख़ा कातती है चाँद के चेहरे में रहती है
रहमान मुसव्विर
सिरहाने रख के चर्ख़ा और पूनी
थकी बुढ़िया ज़रा लेटी हुई है
नजमा साक़िब
टूट जाएगा ये चर्ख़ा जिस्म का चलते हुए
और क़ैदी क़ैद से आख़िर रिहा हो जाएगा
ताजुन्निसा ताज
Saturday, March 15, 2025
"पुल" लफ़्ज़ पर कुछ अश'आर
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ
दुष्यंत कुमार
पक्ष-ओ-प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं
बात इतनी है कि कोई पुल बना है
दुष्यंत कुमार
उदासी आसमाँ है दिल मिरा कितना अकेला है
परिंदा शाम के पुल पर बहुत ख़ामोश बैठा है
बशीर बद्र
झिलमिलाते हैं कश्तियों में दिए
पुल खड़े सो रहे हैं पानी में
बशीर बद्र
'हसीब'-सोज़ जो रस्सी के पुल पे चलते थे
पड़ा वो वक़्त कि सड़कों पे चलना भूल गए
हसीब सोज़
ज़िंदगी की ये घड़ी टूटता पुल हो जैसे
कि ठहर भी न सकूँ और गुज़र भी न सकूँ
अहमद फ़राज़
दरिया उतर गया है मगर बह गए हैं पुल
उस पार आने जाने के रस्ते नहीं रहे
नवाज़ देवबंदी
“ख़याल” अब खाइयाँ है नफ़रतों की
वो पुल जो जोड़ते थे वो कहाँ है
सतपाल ख़याल
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